रोटी के टूकड़े


बहुत दिनों के बाद माँ ने,रोटी आज बनायी थी
शंभु चाचा घर आए थे,चाची भी तसरीफ लायी थी।

चुन्नी,चिंटू,मून्नी,मिंटू सबके चेहरे पर खुशहाली थी,
पेट में चुहे कुद रहे थे पर बाहर हरियाली थी।

बापू के चेहरे पर जाने,कैसे अजब से भाव थे?
बात पुरानी सोच-सोचकर बापू भी पछताए थे।

दद्दू ने बाँटा भाई- भाई को,बाँट दिया घर सारा था,
बर्तन बाँटे,आँगन बाँटा,बाँट दिया चौबारा था।

रोटी के टुकड़े देख-देख कर भाव ये मन में आते थे,
क्या पहले घर के मुखिया,घर को ही आग लगाते थे?

माँ के गहनों को बिकते देखा,बापू को बैल-सा जुतते
देखा और रोते बच्चों को देखा था,
सिमट चुके घर में मैंने,इच्छाओं को मरते देखा था।

शंभु चाचा और बापू के,आँसू ना कम होते हैं,
पता चला है ईसी बात से, अपने तो अपने होते हैं ।

काश! जुड़ पाते रोटी के टुकड़े और मिल पाते बिछड़े जन,
एकल से संयुक्त हो जाते खण्ड-खण्ड में बिखरे मन।

                                         -प्रशांत गाहिरे

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Category : Nostalgia    23/07/2017


जीवन की परीक्षा



  जीवन की परीक्षा सबसे कठिन है
  पास होकर के खुद पर अभिमान होगा
  छुट-पुट इम्तेहानो के डर से बैठना
  जिंदगी  का अपमान होगा
  लड़ते रहना है जब तक श्वास चलती रहे
  हर कदम जीत की सोच पलती रहे
  हौसला ऐसा हो जो दुनिया बदल दे
  कुछ करने की आग यूँ ही जलती रहे
  औरो के लिए जीने का मौका सबसे बड़ा सम्मान होगा
  जिंदगी की परीक्षा सबसे कठिन है
  पास होकर के खुद पर अभिमान होगा ।
  बुजदिल ना बने सदा ध्यान हो
  अपनी खूबी का हरदम हमें भान हो
  किसी की उम्मीद किसी का भरोसा
  टिका है  हम पर सदा ज्ञान हो
  चिंता क्यों हम करें हार के वार की
  कौन कहता है क्या,झूठे संसार की
  डर के हालात से जो मौत का साथ ले
  सचमुच बुजदिल वो इंसान होगा
  जीवन की परीक्षा सबसे कठिन है
  पास होकर के खुद पर अभिमान होगा ।
                                     प्रशांत गाहिरे •••

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Category : Nostalgia    13/07/2017


फिलो अवे भाग-3


मुझे यह तो ज्ञात हो गया था कि,वह डायरी अवश्य ही किसी छात्र की थी।मैंने पुनः अपने खाली समय में उस डायरी को खोला एवं पढ़े गए पन्नों को पलटकर नए पन्नों की ओर बढ़ चला परंतु जो मेरे सामने था,उसे देखकर मैं भौचक्का रह गया
                                ये क्या आगे के ढेर सारे पन्ने उस डायरी से फट कर अलग हो चुके थे।कुछ देर तक तो मैं उन पन्नों के फटने का कारण सोचने लगा परंतु कुछ ना सुझने पर आगे बढ़  चला।अंततः मुझे एक शब्दों से परिपूर्ण पन्ना मिला जो इस प्रकार से था-

दिनांक-10-04-2016                              समय-9:40pm

"आज बहुत दिनों के बाद मैंने अपना फेसबुक अकाउंट चेक किया।तभी अचानक मुझे उसकी प्रोफाइल दिख गई, मैंने रूककर उसे फ्रेंड रिकवेस्ट भेजा।किसी ऐसी लड़की को जिसे मैं करीब से नहीं जानता था, भेजा गया मेरा पहला फ्रेंड रिकवेस्ट था।कुछ समय के बाद मुझे पता चला कि,उसने मेरा रिकवेस्ट स्वीकार कर लिया था।मुझे अच्छा लग रहा था,मैंने उसे हाई बोला और उधर से भी सेम मैसेज आया।वैसे तो मैं लड़कियों से बहुत कम बात  करता हूँ लेकिन उससे बात करके अच्छा लगा।पढाई से रिलेटेड हमने बहुत सी बातें की।मुझे पता चला कि,वह भी उसी टाॅपिक पर असाईनमेंट लिखने का सोच रहीं थी,जो मैंने सोचा था।मन ही मन मैंने कहा Same Pinch.....
                                        To be continued.....

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Category : Nostalgia    16/07/2017


जवाब चाहते प्रश्न



बुजुर्ग भटकने को मजबूर क्यों हैं 
दर-दर झुकने को मजबूर क्यों हैं 
देने वाले हाथ फैले हैं क्यों 
उनकी जिंदगी का ये दस्तुर क्यों है 
क्या मिट गई है मानवता जग से
हर जगह स्वार्थ का बसेरा है 
अपना कौर खिलाने वाला 
क्यों भूखे पेट सो रहा है 
तड़प उठता था माँ का हृदय 
जिस बेटे के तन की तपन से
माँ को भटकता छोड़ वो बेटा
सो रहा है क्यों अमन से
निर्बुद्धि बच्चो के पालक
यूँ थक कर चूर क्यों हैं
बुजुर्ग भटकने को मजबूर क्यों हैं
दर-दर झुकने को मजबूर क्यों हैं
जीवन की पूँजी लगा दी 
जिनकी इच्छापूर्ति में 
बिसर गए दाता को क्यों फिर 
वो बच्चे यश और कीर्ति में 
क्या स्वार्थ बह रहा नव पीढ़ी के 
रग में अविरल धारा सा
भटक रही है क्यों बूढ़ी माँ 
बाप फिरे क्यों मारा सा
सबको गले लगाने वाले 
अपनों से दूर क्यों हैं
बुजुर्ग भटकने को मजबूर क्यों हैं
दर-दर झुकने को मजबूर क्यों हैं                                                    ------ प्रशांत गाहिरे

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Category : Thoughts    11/06/2017


फिलो अवे भाग-2


अगले दिन भी प्रत्येक क्षण वहीं दो शब्द मस्तिष्क में गुँज रहे थे-"फिलो अवे"।मैंने उन शब्दों का अर्थ गूगल पर भी छान मारा,मुझे ढेरों अर्थ मिले परंतु मुझे उन शब्दों के वास्तविक अर्थ की प्राप्ति न हो सकी।अपने खाली समय में मैं उस डायरी को लेकर एकांत में बैठ गया और अर्धमन से पन्ना पलटाया।अगला पन्ना लेखक के शब्दों में ऐसा था-

दिनांक- 21/07/2015                   समय-8:45pm

"आज काॅलेज का पहला दिन था और अजीब-सी घबराहट थी मन में।बारहवीं कक्षा तक का सफर तो अच्छा ही रहा लेकिन अब भगवान जाने आगे आगे क्या होगा?ऐसा लग रहा था कि,जैसे सब काॅलेज घुमने आए थे।उन दो लड़कियाँ को देखकर जो सीढ़ियों पर बैठी थीं ऐसा लगा जैसे वे माॅडलिंग करने काॅलेज आयीं थीं ।काॅलेज के पहले दिन ही मैंने जान लिया कि,काॅलेज ठीक वैसा ही होता है जैसा मैंने सोचा था क्योंकि मुझे कुछ लड़के बाइक उड़ाते भी दिख गए थे ।
                           आज पहली बार ये एहसास हुआ कि, मैं बड़ा हो गया हूँ, मेरा प्यारा बचपन गुजर चुका है और मैं बड़े लोगों के बीच हूँ ।आज एक भी क्लास नहीं लगी इसलिए थोड़ा अच्छा लग रहा था।दोपहर में मैं काॅलेज के कैंटीन पहुँचा जहाँ लोग नाश्ता करने कम,बतियाने ज्यादा पहुँचे थे।कैंटीन के अंतिम छोर पर अपनी ही दुनिया में खोए,जोड़ो को देखकर  मैं सोच रहा था कि,वे काॅलेज पढ़ने आते हैं या ये सब करने अचानक मुझे पापा की वह बात याद आ गई जो उन्होंने घर से निकलते वक्त मुझसे कहा था कि- काॅलेज जाकर कई लोग भटक जाते हैं ।तब मैंने पापा से न भटकने का वादा किया 
था।काॅलेज के पहले ही दिन ने बहुत थका दिया।किराए के कमरे में खुद से बनाया गया खाना खाते वक्त माँ की याद आ रही थी कि,कैसे बहुत अच्छे खाने में भी मैं कमियाॅ निकाला करता था और आज कमियों से भरे खाने को भी बिना किसी शिकायत के खा रहा था "।
                To be continued....

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Category : Nostalgia    12/06/2017


फिलो अवे



ठीक ऐसा ही विचार मेरे मन में भी आया था-"यह क्या है "?

                        वह दिन भी किसी आम दिन की तरह था।उस दिन  काॅलेज से वापस लौटते वक्त सहसा मेरा पूरा ध्यान एक अजीब-सी वस्तु पर जाकर ठहर गया,पास जाकर देखने पर पता चला कि वह एक डायरी है।मैं उस डायरी के मालिक को आस-पास ढूंढने लगा परंतु किसी को आस-पास न पाकर उस डायरी को उठा लिया लेकिन तभी मेरे मन में ख्याल आया कि किसी की डायरी पढ़ना अच्छी बात नहीं और इस वजह से मैंने उस डायरी को न पढ़ने का निश्चय किया ।मनुष्य  की फितरत है कि,उसे जिस काम के लिए मना किया जाता है, वह वही करता है इसलिए मैने भी उस डायरी को अपने पास रख लिया एवं अपने हाॅस्टल आ गया।मन में अजीब-से विचार आ रहे थे कि- "कहीं कोई गलती तो नहीं हो गई,कहीं कुछ गड़बड़ तो नहीं, क्या होगा उस डायरी में "आदि।मैं उस डायरी को पढ़ने के लिए बहुत उत्साहित था और आखिर रात 9:00 बजे वह क्षण आ ही गया।मेरे आँखों में अजीब सी चमक थी,चेहरे पर थोड़ी घबराहट और शरीर में अजीब-सा कम्पन।
                       ज्यों ही मैने डायरी को खोला मैं आश्चर्यचकित रह गया क्योंकि उसमें न तो किसी का नाम था,न पता और न ही फोन नंबर।उसमें केवल दो अजीब-से शब्द लिखे थे-"फिलो अवे"।मैं उन शब्दों का अर्थ जानना चाहता था परंतु उस रात न जान पाया।उस रात बहुत मुश्किल से सो पाया,मन में सिर्फ दो शब्द चल रहे थे-"फिलो अवे"।
                           To be continued.........

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Category : Nostalgia    08/06/2017