NIRBHAYA – THE FEARLESS SOUL



Her cries for help went unheeded as six animals including a juvenile took turns to play demonically with her body… biting her, raping her, hitting her with an iron rod, shoving it inside her and even using hands to tear her inner organs out.

The heinous crime that took place on 16 December 2012 left people all around the world numb and startled as to the cold an demonic act and the pervert mentality of the inflictors. It played a key role in awakening the people against a crime that mostly went unheard and ignored in the male dominated Indian society.

Was she out too late? Was she dressed provocatively? Was she drinking? Did she consider herself as free as a boy? 

If a girl is not fully covered from head to toe, she is inviting men to do something to her; if a woman is in a sexual relationship with a boy, she belongs to all of his friends too; when a man drinks he turns into an untamed animal, and when a woman does the same she is looking forward to be raped; a girl deserves to be raped because her mother doesn’t have respectable character….!!!
When nothing justifies, blame the mother… 

That’s the patriarchal Indian society. Instead of saying “Don’t rape“, they choose to say “Don’t get raped“.

The horrific gang-rape and fiendish murder outraged the country. The fury of the youth could be seen on the streets not only in the nation, but worldwide. Yet there were some shameless law keepers of the country who reflected the patriarchal society and blamed the victim of the rape instead of those accused.   
  
Human lust took its devilish form and raped humanity.
The law keepers delayed justice and disgraced humanity.

The gruesome crime shocked the collective conscience of the society. And the fact that it took the law keepers of the country 4 years and 5 months to punish the rapists of humanity is utterly shameful.
 The Supreme Court confirmed the death sentence awarded to the four convicts in the diabolic Nirbhaya gang rape case of 2012, the crime that sparked nationwide outrage over gender-based violence against women in the country. However, there was one more convict involved in the inhuman crime, a juvenile, portrayed as the “most brutal “face of the fateful night’s violence, accused of ripping apart the woman’s intestines, has been released after serving his probation period, and is said to be oblivious of the latest developments of the case, one which numbed the entire nation and brought the youth to the streets. 

The century that we live in promises gender equality, flaunts feminism, boasts women empowerment, all of this and more. What we forget to understand is that only enforcing laws to implement women empowerment is not enough. What is more important is modifying the pervert mentality of the men and chiselling this fact into their heads that women are not born to satisfy their sexual appetite and quench their desires.

The question that still hovers is
 “If not now, when?”, “If not us, who?”
Rape cases in India is still a burning issue.

 Let us start with NOW, let us start with US. Now is the time to act. Let us make ourselves the pioneer of feminism and be the voice the world admires, build a character the world idolises. Because only WE can help make the world a better place for US, for all our mothers, sisters and friends and daughters out there fearing a life that they dream to live because of the pervert mentality of the society.
Write-up credit:- Sukriti Das 

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Category : Thoughts    23/05/2017


वह पापा की शहजादी थी


वह पापा की शहजादी थी 
बड़े नाजों से वो पली बढ़ी 
मेहनत की उसने जीवन में 
और हुई अपने पैरों पे खड़ी 
वो गयी बड़े एक शहर में 
रम गयी जीवन की लहर में 
वह न जान सकी अँधेरा है 
हैवानियत का वहां बसेरा है 
उस रात उसे कुछ देर हुई 
सब चले गयी वह तनहा थी 
दरिंदगी जिसके करीब थी 
एक बेबस सा वो लम्हा थी 
थी सहमी सी वो उन राहों में 
तब उसको था एक हाथ दिखा  
मानवता का वह हत्यारा 
अपने साथियों के साथ दिखा
 
एक मोड़ जहां अँधेरा था 
था वहां भेडियों का साया 
जब आँखें खोली उसने तो 
उन दरिंदो को था सामने पाया 
 
एक बेटी उस दिन चीखी थी 
पर कोई मदद न मिली उसे 
उन भेडियों ने उसको नोचा 
और वही तडपता छोड़ गए 
बड़ा शर्मनाक वह मंजर था 
थी इंसानियत सबकी खोयी 
उसकी हालत को देख देख 
मानवता तिल –तिल कर रोयी 
जब उसके पापा को सच पता चला 
उनका दिल सहसा दहल गया 
जो चेहरा कल तक खिला सा था 
वो चेहरा बिलकुल बदल गया 
लाखों चेहरे यूँ ही बदले 
जीवन लाखों यूँ ही बिगड़े 
खुले गुनहगार वो घूम रहे 
ताकत के नशे में झूम रहे 
क़ानूनी हाथ हुए छोटे  
शायद लालच ने है उन्हें तोड़ दिया 
गुनहगार तो यूँ हम सब भी है 
जो उन कुत्तो को आवारा छोड़ दिया 
निर्भया के लिए जी लगा दिया 
फिर भी न उसको बचा सके 
हाँ दर्द मुझे भी हुआ था जब 
गुनहगारों को सजा न दिला सके 
आवाज उठेगी जब जब भी 
निज पाखंडी उसे दबाएंगे 
बदलाव तभी है संभव जब
हम सब मिलकर सामने आएंगे 
हैं लाखों लड़कियां उस जैसी | 
इंसाफ जिन्हें है मिला नही 
हर पल इसी खौफ में जीतीं हूँ 
कहीं मैं तो अगली निर्भया नही 

काव्य –रचना 
शैलेश कुमार पाण्डेय 
जी. जी. यू. बिलासपुर

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Category : Thoughts    06/05/2017


कोम्प्लिकेटेड मेजबानी


मेरी बेकरारी बढ़ती ही जा रही थी ,.......
बढ़ती ही जा रही थी .......
और वो आ ही गई यानी मेरी छुट्टियाँ ........
आये हाय मस्त सोने और खाने मिलेगा 
तभी दरवाजें पर किसी ने दस्तक दी ,

      अरे यार मेरी छुट्टियाँ यह मेहमान क्यूँ आ जाते हैं ? बार–बार वो भी छुट्टियों में | आज तो मूवी का प्लान था वो भी गया तेल लेने और तो और मेरे पूरे दिन सोने के प्लान का पापड़ बन गया | पापड़ से याद आया माँ ने पापड़ तलने कहा था मेहमानों के लिए पर मैंने तो पापड़ तलते-तलते सारे पापड़ चट दिये ; अब क्या होगा....उमम्म्म ....... ये काम करो वो काम करो .....ह्ह्ह्ह 

एक फोन तो चार्ज हो नहीं पाता, दूसरों के फोन के कारण और उपर से ये अच्छा बनने का नाटक! वैसे बहुत एक्टिंग करनी पड़ जाती है सबके सामने..... पर कोई नई यार मै तो बचपन से एक्ट्रेस हूँ | हीहीही .......

अरे पता है ... ये नोटिस करने वाली बात है कि मेहमानों के भी कई प्रकार होते है जैसे चिल्हर मेहमान , कुछ दिन वाले मेहमान, कई दिन वाले मेहमान, मस्त वाले मेहमान अरे मै तो इस पर P.H.D. कर लूँ | हे.. हे.. 

  खैर हर चीज का अपना एक अलग ही मजा होता है और कुछ दिन साथ रहने के बाद मेहमानों से ही गहन लगाव हो जाता है, लगता था जिस दिन मेहमान जायेंगे त्यौहार मनाऊँगी पर ऐसा नही हो पाता | अब मैं जानी मेहमान नवाजी का महत्व .. मेहमानों से शरबत पूछने के बजाय फोन चार्ज है या नही ये पूछती हूँ , मेजबानी के नए पैतरें अपनाती हूँ | अपने से लगने लगते है वो अतिथि खैर अब उनके जाने का भी दिन आ गया “दिल में दुःख वाली खुजली हो रही” अब क्या जाना तो पड़ेगा उनको भी खैर एक पल की बात ये है कि जाने की बेला में आगे आकर विदा करना चाहिए क्यूंकि वो प्यार का नजराना देकर जाते है... पर कई बार माँ T.D.S. काटकर चिल्हर थमा देती है ... वही कचरा हो जाता है | मेरे तो फ्यूचर इन्वेस्मेंट के प्लान भी बन गये थे पर चिल्हर देख दिल को पिपरमेंट से ही बहला लिया मैंने | 

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Category : Uncategories    06/05/2017


सच्चा देशभक्त : बास्को


यह एक सच्ची घटना है जो दो दशक पहले की है जब भारतीय सेना कश्मीरी घुसपैठियों के खिलाफ संघर्ष कर रही थी 
कारगिल सेक्टर के बेस कैंप में सेना के मास्टर मेजर नारायण राणा अपने सर्च डॉग बास्को के साथ रोज लैंडमाइंस की खोज पर जाया करते थे हर रोज के भांति उस रोज भी सर्द हवाएं चल रही थी सुबह के करीब 8 बजे थे और मेजर राणा अपने समझदार साथी बास्को के साथ गश्त पर थे सेना के इस समझदार डॉग की सूझबूझ ने कई बार बड़े हादसों को टाला था इसलिए सब उसकी काबिलियत पर काफी भरोसा करते थे |
उस दोपहर वहां से सेना के अफसरों का एक बड़ा काफिला गुजरने वाला था इसलिए हर संभव सावधानी बरती जा रही थी 
कैंप के गेट के बाहर स्थानीय निवासी कादिर की चाय की दुकान थी जहा अक्सर जवान आया जाया करते कादिर सेना को संदिग्धों की मुखबिरी भी किया करता था इसलिए मेजर भी वहां अक्सर रुका करते थे और कादिर से उनकी अच्छी जमती थी 
उस रोज कादिर की दुकान पर एक अजनबी भी था और और बातचीत में उसने मेजर से वहां रोजगार के लिए आए होने की बात कही लेकिन आज हमेशा अपनी धुन में रहने वाला बास्को उस पर काफी भौंक रहा था यह बात मेजर को भी अस्वभाविक लगी लेकिन मेजर बास्को को लेकर वहा से चले गये 
बास्को बार बार कादिर की दुकान की तरफ बढ़ने की कोशिश करता लेकिन मेजर राणा को लगा कि शायद बास्को की दिलचस्पी वहां रखे बिस्किटों में है 
कैंप पहुच कर मेजर ने उसे बांध दिया और पोस्ट पर चले गए लेकिन बास्को लगातर भौकता रहा 
घंटो की मशक्कत के बाद बास्को वहां से अपनी चैन तुडवा कर भाग निकला और सीधा कादिर की दुकान की तरफ बढ़ा उसे लग रहा था कि वहां कुछ तो गड़बड़ जरुर है जैसे ही वह गेट के पास पंहुचा तो उसने देखा कि कादिर उस अजनबी के साथ मिलकर पूरे क्षेत्र में विस्फोटकों का जाल बिछ्वा चुका था और थोड़ी ही देर में सेना का काफिला वहां पहुचने वाला था 
बास्को वतन को संकट में देख बिना वक़्त गवाये उस अजनबी पर टूट पड़ा और उसकी गर्दन पर अपने दांत गड़ा दिए यह देख गद्दार कादिर ने उस पर चाकू से कई वार किए लेकिन उसने अपने दांतों के घातक वार से  उस आतंकी को अधमरा कर दिया और पूरी ताक़त बटोर कादिर पर टूट पड़ा और उसे अपनी मजबूत पकड़ से रोके रखा 
सेना के काफिले में सबसे आगे चल रहे लेफ्टिनेंट शिंदे ने संदिग्धों को दूर से देख फौरन काफिले को रोक दिया और जब सेना की एक पैदल टुकड़ी वहां पहुची तो उन्होंने देखा की दोनों गद्दार विस्फोटकों के ढेर के बीच अचेत पड़े हुए है और अपनी आखिरी सांस तक लड़ने वाला सेना का वफादार बास्को शहीद हो गया है लेकिन उसने सैकड़ों सैनिकों की जन बचा ली 
लेफ्टिनेंट साहब ने बड़े गंभीर स्वर में कहा कि आज इस बेजुबान ने साबित कर दिया कि इंसानों से कहीं  बेहतर जानवर है जिनमे इंसानों से कही ज्यादा इंसानियत हैं 
अगर बास्को कुत्ता न हो के कोई इंसान होता तो शायद वीरता की इस अनोखी शौर्यगाथा को दुनिया के सामने आने में 20 साल का समय नही लगता 
कहानी 
शैलेश पाण्डेय    

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Category : Nostalgia    06/05/2017


नमक का स्वाद


एक बार एक परेशान और निराश व्यक्ति अपने गुरु के पास पहुंचा और बोला –“गुरुजी मैं ज़िन्दगी से बहुत परेशान हूँ | 
मेरे ज़िन्दगी में परेशानियों और तनाव के सिवाय कुछ भी नही हैं | 
कृपया मुझे सही राह दिखाइए “| 

गुरु ने एक गिलास में पानी भरा और उसमे मुट्ठी भर नमक डाल दिया |
 फिर गुरु ने उस व्यक्ति से पानी पीने को कहा | 
उस व्यक्ति ने ऐसा ही किया | 

गुरु:- इस पानी का स्वाद कैसा है ?? 
“बहुत ही ख़राब है उस व्यक्ति ने कहा” |

फिर गुरु उस व्यक्ति को पास के तालाब के पास ले गये |
 गुरु ने उस तालाब में भी मुठ्ठी भर नमक डाल दिया फिर उस व्यक्ति से कहा – इस तालाब का पानी पीकर बताओ की कैसा है |
उस व्यक्ति ने तालाब का पानी पिया और बोला – गुरुजी यह तो बहुत ही मीठा है | 

 गुरूजी ने कहा –“बेटा जीवन के दुःख भी इस मुठ्ठी भर नमक के सामान ही है | 
जीवन के दुखों की मात्रा वही रहती है – न ज्यादा न कम | 
लेकिन यह हम पर निर्भर करता है कि हम दुखों का कितना स्वाद लेते हैं | 
यह हम पर निर्भर करता है कि हम अपनी सोच एवं ज्ञान को गिलास की तरह सीमित रखकर रोज खारा पानी पीते है या फिर तालाब की तरह बनकर मीठा पानी पीते है |”

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Category : Thoughts    01/05/2017


The Elephant Rope


As a man was passing the elephants, he suddenly stopped, confused by the fact that these huge creatures were being held by only a small rope tied to their front leg. No chains, no cages. It was obvious that the elephants could, at any time, break away from their bonds but for some reason, they did not.

He saw a trainer nearby and asked why these animals just stood there and made no attempt to get away. “Well,” trainer said, “when they are very young and much smaller we use the same size rope to tie them and, at that age, it’s enough to hold them. As they grow up, they are conditioned to believe they cannot break away. They believe the rope can still hold them, so they never try to break free.”

The man was amazed. These animals could at any time break free from their bonds but because they believed they couldn’t, they were stuck right where they were.

Like the elephants, how many of us go through life hanging onto a belief that we cannot do something, simply because we failed at it once before?

Failure is part of learning; we should never give up the struggle in life.

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Category : Nostalgia    25/04/2017


अगले जनम मोहे भगवान न किजों


होली की शाम का वक़्त था | हम सब को मौसी जी के यहाँ होली मिलने जाना था | मम्मी –पापा गाड़ी से जाने वाले थे और मुझे और भईया को ऑटो से जाना था |

               मम्मी ने दोनों भाइयों को पहले निकलने के लिए बोला | क्योंकि हमे कुछ दूर पैदल चलना पड़ता ऑटो लेने के लिए औए उसके बाद ऑटो से उतरकर फिर पैदल जाना था | दोनों लोग निकल कर चौराहें पे पहुच गये |”यार आज ऑटो ज्यादा नही चल रहें “ | भईया ने कहा –“होली है, सब छुट्टी मन रहे है “| मैंने कहा |

               करीब दस मिनट बाद एक ऑटो मिला | “भईया काली मंदिर चौराहा चलोगे ?” भईया ने पूछा | “बैठिये भैया “ |

जैसे ही हम काली मंदी चौरहा पहुचें , भैया ने कहा कि दर्शन करते हुए चलते है |

“चलो ठीक है|”

काफी भीड़ थी मंदिर में | तो जूता गायब होने के डर से एक –एक करके हम लोग गये | पहले मै गया और दस सेकंड में हाथ जोड़ के चला आया | फिर भैया गये और पहले वो बहुत देर तक हाथ जोड़ के प्रार्थना करते रहे | फिर पंडित जी ने उन्हें जोर से घंटी बजाने को कहा उस समय मंदिर में आरती हो रही थी |

               टन –टन ,,,,,,,,,,,,,,,, मंदिर की सभी घंटियाँ बहुत जोर-जोर से बजायी जा रही थी | लोग भजन गा रहे थे | मै बाहर खड़ा सब देख रहा था | उसकी आवाजें मुझे परेशान कर रही थी |तभी एक झटके  में मुझे काली देवी का चेहरा दिखा | अगर सारी गड़ना की जाये तो कुल तैतीस –करोड़ देवी-देवता और उनके अरबों मंदिर और उन मंदिरों में घंटो तक पूजा करने वाले लोग और इतना शोर की पूछो मत |

               एक बार अगर भगवान के नजरिये देखा जाये तो इतने लोग हर वक़्त भगवान को परेशान करते रहते रहे न जाने किस बात का रोना रोते है लोग |सब कुछ तो दे दिया है तुम्हे फिर क्या मांगते रहते है ?और ये भी नही की प्यार से मांगना | इतना जोर करके प्रताड़ित करना ईश्वर को |

ये लालच, ये तमाशा देख के भगवान भी सोचता होगा कि यार मै भगवान क्यों बना ? काश ! मै बदनसीब किसी से कह पता की “अगले जनम मोहे भगवान न किजों |”|

------समीर

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Category : Uncategories    25/04/2017


वंडर ऑफ़ बोतल एकांकी (हास्य व्यंग)


पात्र:-

भसकाराम      –       शराबी

फूलनदेवी       -       भसकाराम की पत्नी

लालटेन         -      भसकाराम का मित्र  

कुर्सीमल –       -      सरपंच

बोरादास         -      पंच

टिमटिम चाची    -      वृद्ध महिला

(पर्दा उठता है-................)

         लालटेन का भसकाराम के घर प्रवेश | कुछ छिपाकर दांत दिखातें हुए आता है -

भसकाराम   -    अरे भाई लालटेन ! आते हो कुछ लातें हो, उसे छिपाते हो और दांत दिखाते हो | बात क्या                   

                है ?

लालटेन    -     अरे भसकू हम तोहरे लिए अंग्रेजी अमृत लाया हूँ | पी कर देखो, सरग न दिख जाये तो

                कहना |

भसकाराम   -     पीछे मुड़कर अपनी पत्नी से – अरी फूलों ,हमारा मित्र लालटेन आया है ,हमारे लिए कुछ  

                लाया है, जल्दी जाओ , दो गिलास लेकर आओ |

फुलनदेवी     -    लाती हूँ| काम –धाम तो कुछ करते नहीं हो, बस तुम्हारे नखरे झेलते रहो |

                फुलनदेवी गिलास ले जाकर मेज पर रख देती है और अंदर चली जाती है| 

लालटेन      -    ऐसा लगता है जइसन भौजी को हमारा इहा आना अच्छा नाहीं लगा |

भसकाराम    -    अरे नहीं ऐसी कोई बात नहीं है, वह तो ऐसी ही है |

                लालटेन एवं भसकाराम जमकर शराब पीते है | लालटेन अपने घर चला जाता है |
भसकाराम    -    अरी फूलो हमारा बिछौना लगा दो |

फुलनदेवी     -    जब देखो तब आर्डर झाड़ते हो कुछ खुद भी कर लिया करों |

भसकाराम एवं फुलनदेवी में झगडा हो जाता हैं | भसकाराम नशे में अपनी पत्नी की पिटाई कर देता है |

फुलनदेवी मायके जाने के लिए तत्पर होती है | 

भसकाराम    -    ले जाओ अपनी औलादों को , जीने नही देते |

फुलनदेवी    -     हा –हा मै ही इन्हें अपने साथ दहेज़ में लेकर आयी थी |

भसकाराम   -     अरे तुम कुओ जाने लगी मै ही इन्हें बारात में लेकर गया था |

फुलनदेवी    -     तुम्हारे कारन ही घर का सत्यानाश हुआ है | खाने के लाले पड़ गये है | घर का सामान  

                 बेचकर तो तुम शराब पी गये |

फुलनदेवी घर छोडकर जाती है, तब गाँव वाले उसे न्याय का झांसा देकर रोक लेते है | फुलनदेवी टिमटिम चाची के यहाँ रुक जाती हैं |

                       सुबह पंचायत बुलाई जाती है |

कुर्सीमल      -   टिमटिम चाची ने हमे सब कुछ बता दिया है | भसकाराम तुमने अपनी पत्नी पर हाथ क्यों

                उठाया कुर्सी तोड़ के |

भसकाराम     -  सरपंच जी ऐसा कुछ भी नहीं हुआ था |

टिमटिम चाची  -  ये ससुरा झूठ बोलत है सरपंच जी | इसने शराब पी थी | अरे उही शराब जिसका स्वाद

                पेशाब की भांति होत है |

                अरे इही शराब को पीकर तो छोरा –छोरी लोग डिसकु में नाचत-गात है |

               हमरी संस्कृति को माटी में मिलात है |

बोरादास       -  टिमटिम चाची बिलकुल सही कह रही है , सरपंच जी | हमारा एक भतीजा भी शराब पी

               कर चला रहा था | उसका अक्सिडेंट हो गया अब तो उसका हाथ ही नही रहा जो शराब को

               हाथ लगाये |

                           शराब पीने वालो को होश कहा रहता हैं |

फुलनदेवी    -    यह तो एक लत है, सरपंच जी | एक दिन मुन्नु के पापा और वो लफंगा लालटेन खेत की

                ओर डब्बा लेकर गये थे | मैंने सोचा हवाई –जहाज उड़ाने गये होंगे | मुझे क्या पता था कि                                                  

                डब्बे में भी शराब लेकर गये थे |

                               न्याय कीजिये सरपंच जी |

कुर्सीमल      -   देखो भसकाराम आज तो हम तुम्हे सिर्फ तुम्हारे बच्चो के खातिर छोड़ रहे है, दोबारा ऐसा

                किया तो तुम्हे गाँव से बाहर निकल देंगे कुर्सी तोड़ के |                      

         भसकाराम घर जाता है गाँव के लोग फुलनदेवी को भी समझाकर घर भेज देते है |

         अगली सुबह पुन: गढदे में छिपकर शराब पी रहा था | लालटेन ने देख लिया  

 

लालटेन    -      क्या भस्कू फिर पिनें लग गया हमने तो इ सूना है कि, शराब पीनें से ससुरी  कडनी

          ख़राब हो जाती है |

भसकाराम  -      अरे लालटेन यह तो “वंडर आफ बोतल है “ चाहे जान जाये, हमको तो पीनी है | लें

         तु भी पी |

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Category : Uncategories    25/04/2017


कनेरी


एक बहुत ही पिछड़ा गाँव था जिसका नाम था जल्लाद्गढ़ | जैसाकि गाँव का नाम है वैसा ही लोगो का स्वाभाव था | किसी भी व्यक्ति को किसी अन्य व्यक्ति से कोई हमदर्दी नही थी |उस गाँव में तो मानवता का कही नामोनिशान तक न था | 
उसी गाँव में रहती थी एक चौदह वर्ष की लड़की जिसका नाम था कनेरी | उसके माता – पिता निर्धनता से ग्रस्त थे कनेरी के पांच भाई- बहन और थे जिसके कारण उनकी स्थति और भी बद्तर हो गयी थी | कभी-कभी तो उन्हें भोजन तक नसीब नही होता था | वे अपने जीवन से बेहद परेशान थे | तब उन्होंने कनेरी के विवाह के बारे में सोचा केवल चौदह वर्ष की कनेरी का विवाह उससे कही बड़े अयोग्य व्यक्ति के साथ तय कर दिया गया | जब कनेरी ने अपने विवाह के बारे में सुना तो उसके पैरों तलें की जमीन ही खिसक गयी परन्तु वह क्या करती विवश थी और साथ ही अशिक्षित भी |
  कनेरी की शादी क्या हुई उस पर विपत्तियों का पहाड़ ही टूट पड़ा उसे अपनी क्षमता से अधिक कार्य अपनें ससुराल में करना पड़ता था | उसकी सास हमेशा उसे दहेज़ न लाने के कारण ताने सुनाया करती थी |वह आंसुओ के घूंट पी कर घुट –घुट कर  जी रही थी | उसे किसी भी प्रकार की कोई आज़ादी नही थी | उसकी हालत बंधुआ मजदूर की भांति हो गयी थी | खेलने –कूदने की उमर में उसे घर-गृहस्थी के कार्य सँभालने पड़ रहे थे | उसके साथ अवमानविय व्यवहार किया जाता था | कभी –कभी तो भोजन भी नसीब नही होता था | उसकी हालत पालतु पशु की भांति हो गयी थी |
    कुछ ही साल बाद कनेरी को पता चला कि वह माँ बनने वाली है तब तो उसकी स्थिति और भी ख़राब हो गयी | इस छोटी उमर में जब वह स्वयं को संभाल नही सकती थी तो वह उस बच्चे को कैसे संभाल पाती | उसका जीवन नर्क से भी बद्तर हो गया था |
कुछ ही दिनों बाद वह माँ बन गयी उसका बच्चा बहुत ही कमजोर था व उसकी स्थिति भी बहुत ही नाजुक हो गयी थी परन्तु अभी उसके बच्चे के जन्म को एक महिना भी नही हुआ हुआ था कि उसके ससुराल वालो ने उसे फिर से सताना शुरु कर दिया उससे और भी अधिक कम लेना शुरु कर दिया अब तो वह और भी कमजोर हो गयी थी उसे अपने जीवन से घृणा होने लगी थी वह उस जीवन से मुक्त होना चाहती थी |
  एक दिन जब वह खेत में कम कर रही थी तब उसकी साथी श्रमिक सहेलियों ने उसे देखकर उसकी कमजोरी का कारण पूछा पहले तो वह घबराई परन्तु जब आस –पास किसी को न देखा तो उसने अपनी आप –बीती कह सुनाई वह रो पड़ी सिसकियाँ लेने लगी | उसकी सहेलियों ने उसके प्रति सहानुभूति दिखाई अब तो कनेरी अपनी सहेलियों से रोज छिप –छिप कर मिलने लगी उनमें से कुछ थोड़ी शिक्षित भी थी उन्होंने उसे बाल - विवाह के बारे में जानकारी दी व पुलिस स्टेशन में एक F.I.R. पत्र के माध्यम से कनेरी की तरफ से भिजवाया |
  पुलिस एक ही दिन में कनेरी के घर पहुंची व मामले की जाँच-पड़ताल करने के पश्चात दोषी व उसके साथ सम्मिलित लोगो को काल-कोठरी में बंद कर दिया कनेरी को यूनिसेफ़ के द्वारा आरक्षण प्रदान किया गया व उसके बच्चे के पालन-पोषण के साथ कनेरी को शिक्षित भी किया गया |
वर्तमान युग में कनेरी की तरह ही देश के कई स्थानों पर कितनी ही लड़कियों का बचपन बर्बाद हो रहा है उनसे उनकी स्वतंत्रता का अधिकार भी छिना जा रहा है | आज आवश्यकता है सरकार इन पिछड़े क्षेत्रों में भी विकास कार्य करें व उन बच्चों की जो एक अच्छा जीवन जीना चाहतें है उनकी आकांक्षाओं को पूरा करें | 
क्या उन्हें अच्छा जीवन जीने का अधिकार नही मिलना चाहिए ? 
---प्रशांत गाहिरे 

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Category : Nostalgia    23/04/2017


Mr. Javid Ahmed Malik "International young scientist Award"



At the "6th International science congress" which is orgainiged by the  "International science community Association" (registered under Ministry of corporate Affairs ,govt. of India) at Hutatma Rajguru Mahavidyalaya; Pune, Maharashtrsa, India; Mr. Javid Ahmed Malik  has won the "International young scientist Award". 

                                                                       Mr.Javed Ahmed Malik is a research scholar in the department of Zoology from GGU. who has recently been awarded for his outstanding invention on his research and scientific work for characterigation of Tephrosia Purpurea Linn so as to unravel the hepatoprotective potential against anti-tubercular drugs induced hepatotoxicity that was presented in Pharmaceutical Science section. The outcome of the scientific investigatons will be helpful in establishing an excellent  hepato-protective drug against Tuberculosis. His study was aimed to characterize Tephrosia purpurea  extract for its hepatophrotective potential against anti-tubercular drugs. For this,the plant was collected and processed to obtain the extract. Then, this extract along with the anti-tubercular drugs were given to experimental white rats for about two months. On observation, the researcher found the hepatoprotective effects of the plant extract. This experimentation was conducted at Toxicology and pharmacology Laboratry of Department of Zoology, under the supervision of Dr. Monika Bhadauria. The research program was financiaaly supported by the UGC-MRP and UGC-BSR.

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Category : People who Achieved    11/04/2017