सत्ता विध्वंस


जो कुर्सी पर जाता है  वो ही घमंडी हो जाता है
न जाने  उनमें इतना पाखण्ड कहाँ से आता है 

राष्ट्रवाद के नारे सारे किसी कोने में दुबक के रोते हैं
और हमारे प्रतिनिधि मखमली  कम्बल लपेट कर सोते हैं 
देश का पोषक किसान तब बैरी नजर आता है
राजकोष का सारा रुपया धनपशु नोचकर खाता है  

भ्रष्टाचार , कालाधन,रोज़गार चुनावी जुमले होते हैं 
 सरसों के खेतों में ये समझो नागफनी को बोते हैं
श्वान  सरीखा  देश भी सिहों को आँख दिखाता है
तब मेरा ह्रदय उन चुनावी वादों को सरेराह नंगा पाता है


राजनितिक रूढ़ता से ग्रसित स्वार्थीयों संतानों सुनो
जनता के दुःख दर्दो से बेखबर ओ नादान सुनो
ये हिंदुस्तान हमारा है हमें खून पसीने से सींचना आता है 
जहा दिलों में है बसता भगत सिंह जो वीरगति को पाता है

अब चाहे हो कोई दल या कोई नेता सुधरने का अवसर एक न होगा
अब प्रजातंत्र की शक्ति दिखेगी 
 पाखण्ड पर संयमित विवेक न होगा

जब निज प्रजातन्त्र का सेवक ही मदमस्त हाथी हो जाता है 
साठ करोड़ जवानों को अंकुश भी थामना आता है   
अंकुश भी थामना आता है 
अंकुश भी थामना आता है

शैलेष पांडेय

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Category : Nostalgia    12/06/2017


स्वाभिमान का जीवन


स्वाभिमान का जीवन

तरक्की की फसल मैं भी काट लेता
अगर औरों की तरह तलवे, मैं भी चाट लेता

बस मेरे लहज़े में जी हुज़ूर, नही था
इसके अलावा मेरा कोई कसूर नही था

मुश्किलें लाखों थी रास्ते में मेरे 
अपनों ने भी उपहास किये जख्मों पर मेरे

अगर पल भर के लिए भी मैं बे-ज़मीर हो जाता
तो इस शोहरत की दुनिया में मैं कब का अमीर हो जाता


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Category : Nostalgia    12/06/2017


फिलो अवे



ठीक ऐसा ही विचार मेरे मन में भी आया था-"यह क्या है "?

                        वह दिन भी किसी आम दिन की तरह था।उस दिन  काॅलेज से वापस लौटते वक्त सहसा मेरा पूरा ध्यान एक अजीब-सी वस्तु पर जाकर ठहर गया,पास जाकर देखने पर पता चला कि वह एक डायरी है।मैं उस डायरी के मालिक को आस-पास ढूंढने लगा परंतु किसी को आस-पास न पाकर उस डायरी को उठा लिया लेकिन तभी मेरे मन में ख्याल आया कि किसी की डायरी पढ़ना अच्छी बात नहीं और इस वजह से मैंने उस डायरी को न पढ़ने का निश्चय किया ।मनुष्य  की फितरत है कि,उसे जिस काम के लिए मना किया जाता है, वह वही करता है इसलिए मैने भी उस डायरी को अपने पास रख लिया एवं अपने हाॅस्टल आ गया।मन में अजीब-से विचार आ रहे थे कि- "कहीं कोई गलती तो नहीं हो गई,कहीं कुछ गड़बड़ तो नहीं, क्या होगा उस डायरी में "आदि।मैं उस डायरी को पढ़ने के लिए बहुत उत्साहित था और आखिर रात 9:00 बजे वह क्षण आ ही गया।मेरे आँखों में अजीब सी चमक थी,चेहरे पर थोड़ी घबराहट और शरीर में अजीब-सा कम्पन।
                       ज्यों ही मैने डायरी को खोला मैं आश्चर्यचकित रह गया क्योंकि उसमें न तो किसी का नाम था,न पता और न ही फोन नंबर।उसमें केवल दो अजीब-से शब्द लिखे थे-"फिलो अवे"।मैं उन शब्दों का अर्थ जानना चाहता था परंतु उस रात न जान पाया।उस रात बहुत मुश्किल से सो पाया,मन में सिर्फ दो शब्द चल रहे थे-"फिलो अवे"।
                           To be continued.........

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Category : Nostalgia    08/06/2017


सच्चा देशभक्त : बास्को


यह एक सच्ची घटना है जो दो दशक पहले की है जब भारतीय सेना कश्मीरी घुसपैठियों के खिलाफ संघर्ष कर रही थी 
कारगिल सेक्टर के बेस कैंप में सेना के मास्टर मेजर नारायण राणा अपने सर्च डॉग बास्को के साथ रोज लैंडमाइंस की खोज पर जाया करते थे हर रोज के भांति उस रोज भी सर्द हवाएं चल रही थी सुबह के करीब 8 बजे थे और मेजर राणा अपने समझदार साथी बास्को के साथ गश्त पर थे सेना के इस समझदार डॉग की सूझबूझ ने कई बार बड़े हादसों को टाला था इसलिए सब उसकी काबिलियत पर काफी भरोसा करते थे |
उस दोपहर वहां से सेना के अफसरों का एक बड़ा काफिला गुजरने वाला था इसलिए हर संभव सावधानी बरती जा रही थी 
कैंप के गेट के बाहर स्थानीय निवासी कादिर की चाय की दुकान थी जहा अक्सर जवान आया जाया करते कादिर सेना को संदिग्धों की मुखबिरी भी किया करता था इसलिए मेजर भी वहां अक्सर रुका करते थे और कादिर से उनकी अच्छी जमती थी 
उस रोज कादिर की दुकान पर एक अजनबी भी था और और बातचीत में उसने मेजर से वहां रोजगार के लिए आए होने की बात कही लेकिन आज हमेशा अपनी धुन में रहने वाला बास्को उस पर काफी भौंक रहा था यह बात मेजर को भी अस्वभाविक लगी लेकिन मेजर बास्को को लेकर वहा से चले गये 
बास्को बार बार कादिर की दुकान की तरफ बढ़ने की कोशिश करता लेकिन मेजर राणा को लगा कि शायद बास्को की दिलचस्पी वहां रखे बिस्किटों में है 
कैंप पहुच कर मेजर ने उसे बांध दिया और पोस्ट पर चले गए लेकिन बास्को लगातर भौकता रहा 
घंटो की मशक्कत के बाद बास्को वहां से अपनी चैन तुडवा कर भाग निकला और सीधा कादिर की दुकान की तरफ बढ़ा उसे लग रहा था कि वहां कुछ तो गड़बड़ जरुर है जैसे ही वह गेट के पास पंहुचा तो उसने देखा कि कादिर उस अजनबी के साथ मिलकर पूरे क्षेत्र में विस्फोटकों का जाल बिछ्वा चुका था और थोड़ी ही देर में सेना का काफिला वहां पहुचने वाला था 
बास्को वतन को संकट में देख बिना वक़्त गवाये उस अजनबी पर टूट पड़ा और उसकी गर्दन पर अपने दांत गड़ा दिए यह देख गद्दार कादिर ने उस पर चाकू से कई वार किए लेकिन उसने अपने दांतों के घातक वार से  उस आतंकी को अधमरा कर दिया और पूरी ताक़त बटोर कादिर पर टूट पड़ा और उसे अपनी मजबूत पकड़ से रोके रखा 
सेना के काफिले में सबसे आगे चल रहे लेफ्टिनेंट शिंदे ने संदिग्धों को दूर से देख फौरन काफिले को रोक दिया और जब सेना की एक पैदल टुकड़ी वहां पहुची तो उन्होंने देखा की दोनों गद्दार विस्फोटकों के ढेर के बीच अचेत पड़े हुए है और अपनी आखिरी सांस तक लड़ने वाला सेना का वफादार बास्को शहीद हो गया है लेकिन उसने सैकड़ों सैनिकों की जन बचा ली 
लेफ्टिनेंट साहब ने बड़े गंभीर स्वर में कहा कि आज इस बेजुबान ने साबित कर दिया कि इंसानों से कहीं  बेहतर जानवर है जिनमे इंसानों से कही ज्यादा इंसानियत हैं 
अगर बास्को कुत्ता न हो के कोई इंसान होता तो शायद वीरता की इस अनोखी शौर्यगाथा को दुनिया के सामने आने में 20 साल का समय नही लगता 
कहानी 
शैलेश पाण्डेय    

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Category : Nostalgia    06/05/2017


The Elephant Rope


As a man was passing the elephants, he suddenly stopped, confused by the fact that these huge creatures were being held by only a small rope tied to their front leg. No chains, no cages. It was obvious that the elephants could, at any time, break away from their bonds but for some reason, they did not.

He saw a trainer nearby and asked why these animals just stood there and made no attempt to get away. “Well,” trainer said, “when they are very young and much smaller we use the same size rope to tie them and, at that age, it’s enough to hold them. As they grow up, they are conditioned to believe they cannot break away. They believe the rope can still hold them, so they never try to break free.”

The man was amazed. These animals could at any time break free from their bonds but because they believed they couldn’t, they were stuck right where they were.

Like the elephants, how many of us go through life hanging onto a belief that we cannot do something, simply because we failed at it once before?

Failure is part of learning; we should never give up the struggle in life.

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Category : Nostalgia    25/04/2017


कनेरी


एक बहुत ही पिछड़ा गाँव था जिसका नाम था जल्लाद्गढ़ | जैसाकि गाँव का नाम है वैसा ही लोगो का स्वाभाव था | किसी भी व्यक्ति को किसी अन्य व्यक्ति से कोई हमदर्दी नही थी |उस गाँव में तो मानवता का कही नामोनिशान तक न था | 
उसी गाँव में रहती थी एक चौदह वर्ष की लड़की जिसका नाम था कनेरी | उसके माता – पिता निर्धनता से ग्रस्त थे कनेरी के पांच भाई- बहन और थे जिसके कारण उनकी स्थति और भी बद्तर हो गयी थी | कभी-कभी तो उन्हें भोजन तक नसीब नही होता था | वे अपने जीवन से बेहद परेशान थे | तब उन्होंने कनेरी के विवाह के बारे में सोचा केवल चौदह वर्ष की कनेरी का विवाह उससे कही बड़े अयोग्य व्यक्ति के साथ तय कर दिया गया | जब कनेरी ने अपने विवाह के बारे में सुना तो उसके पैरों तलें की जमीन ही खिसक गयी परन्तु वह क्या करती विवश थी और साथ ही अशिक्षित भी |
  कनेरी की शादी क्या हुई उस पर विपत्तियों का पहाड़ ही टूट पड़ा उसे अपनी क्षमता से अधिक कार्य अपनें ससुराल में करना पड़ता था | उसकी सास हमेशा उसे दहेज़ न लाने के कारण ताने सुनाया करती थी |वह आंसुओ के घूंट पी कर घुट –घुट कर  जी रही थी | उसे किसी भी प्रकार की कोई आज़ादी नही थी | उसकी हालत बंधुआ मजदूर की भांति हो गयी थी | खेलने –कूदने की उमर में उसे घर-गृहस्थी के कार्य सँभालने पड़ रहे थे | उसके साथ अवमानविय व्यवहार किया जाता था | कभी –कभी तो भोजन भी नसीब नही होता था | उसकी हालत पालतु पशु की भांति हो गयी थी |
    कुछ ही साल बाद कनेरी को पता चला कि वह माँ बनने वाली है तब तो उसकी स्थिति और भी ख़राब हो गयी | इस छोटी उमर में जब वह स्वयं को संभाल नही सकती थी तो वह उस बच्चे को कैसे संभाल पाती | उसका जीवन नर्क से भी बद्तर हो गया था |
कुछ ही दिनों बाद वह माँ बन गयी उसका बच्चा बहुत ही कमजोर था व उसकी स्थिति भी बहुत ही नाजुक हो गयी थी परन्तु अभी उसके बच्चे के जन्म को एक महिना भी नही हुआ हुआ था कि उसके ससुराल वालो ने उसे फिर से सताना शुरु कर दिया उससे और भी अधिक कम लेना शुरु कर दिया अब तो वह और भी कमजोर हो गयी थी उसे अपने जीवन से घृणा होने लगी थी वह उस जीवन से मुक्त होना चाहती थी |
  एक दिन जब वह खेत में कम कर रही थी तब उसकी साथी श्रमिक सहेलियों ने उसे देखकर उसकी कमजोरी का कारण पूछा पहले तो वह घबराई परन्तु जब आस –पास किसी को न देखा तो उसने अपनी आप –बीती कह सुनाई वह रो पड़ी सिसकियाँ लेने लगी | उसकी सहेलियों ने उसके प्रति सहानुभूति दिखाई अब तो कनेरी अपनी सहेलियों से रोज छिप –छिप कर मिलने लगी उनमें से कुछ थोड़ी शिक्षित भी थी उन्होंने उसे बाल - विवाह के बारे में जानकारी दी व पुलिस स्टेशन में एक F.I.R. पत्र के माध्यम से कनेरी की तरफ से भिजवाया |
  पुलिस एक ही दिन में कनेरी के घर पहुंची व मामले की जाँच-पड़ताल करने के पश्चात दोषी व उसके साथ सम्मिलित लोगो को काल-कोठरी में बंद कर दिया कनेरी को यूनिसेफ़ के द्वारा आरक्षण प्रदान किया गया व उसके बच्चे के पालन-पोषण के साथ कनेरी को शिक्षित भी किया गया |
वर्तमान युग में कनेरी की तरह ही देश के कई स्थानों पर कितनी ही लड़कियों का बचपन बर्बाद हो रहा है उनसे उनकी स्वतंत्रता का अधिकार भी छिना जा रहा है | आज आवश्यकता है सरकार इन पिछड़े क्षेत्रों में भी विकास कार्य करें व उन बच्चों की जो एक अच्छा जीवन जीना चाहतें है उनकी आकांक्षाओं को पूरा करें | 
क्या उन्हें अच्छा जीवन जीने का अधिकार नही मिलना चाहिए ? 
---प्रशांत गाहिरे 

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Category : Nostalgia    23/04/2017


All the best for your future



Finally I put down my pen and give the paper one final look. It looks fine. I have revised once, do not have patience for another revision. I think I can pull around 45.  I look up at the wall clock, still one more hour to go. I look around, all people are writing down furiously. My friend sitting across looks back for a moment, smiles and continues writing. I look at my paper again. 45 does not seem too bad. I have got 12 out of 30 in internals, 2 marks for attendance and 3 marks for the copied assignment. So it totals to 62. Not bad. I get up to give my paper. But the invigilator gives a nasty look and indicates me to sit back. Left with no other choice, I sat back. I just can not believe it. This is the final paper of my final year and I am not allowed to leave the exam hall. What could be more perplexing. This time it hits me. No more of GGU. My days here are done. I can not believe how the years have flown by. The first year seemed a bit slow. That was the year I got to know the university properly. At first I was critical to every aspect of the university. Criticizing the infrastructure, the faculty, the facilities. Almost everything. Everything in the university seemed wrong. But as the next year approached I started to develop a understanding for the place and actually started to enjoy and appreciate the place, the events, the fest and everything. By the final year I had fallen in love with the place.

This place is where I had developed my social skills, made many friends. Honestly, I might not remember all of them. But at the same time I am sure whenever I will think of them, it would not fail to bring a smile on my face. We might have fought several times but in the end everything became alright. Those small silly fights over eating tiffin, late night chats. And the best part calling our friends crush as bhabhi. Just remembering all these things now makes me so happy.

I do not know how my new life is going to be, but definitely the lessons learnt here would be helpful and will help me later on in the future.

Oh Shit! The invigilator is walking towards me. Have I said anything out loud ??? I dont think so. He asks for my paper. I hand it over to him with a sigh of relief. I collect my belongings and as I am about to step back the invigilator stops me. With a smile on his face he says ,

All the Best for your future.   

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Category : Nostalgia    09/04/2017