११: २५ की लास्ट लोकल ...........!


अब तक रात के  ९: २० बज चुके थे, मैं अब भी शांत लहरों की तरह वहां बैठी रही ,हालात कहाँ ले जाना चाहते है मैं नहीं जानती |लोगो को अपनी ज़िन्दगी में आगे बढ़ते देख रही हूँ |मेरे देखने में ही कितने आये और गए पर मैं अब भी ये सोच रही हूँ
की उन्हें अपने प्यार के बारे में बता कर मैंने क्या गलती की ?
लो अब तो १०:१५ बज चुके हैं मेरी नजरो के सामने से फिर से एक ट्रेन जा चुकी हैं जो मुझे मेरे प्यार से मिलवाने ले जा सकती थी | पर....................पर मैं चुप हूँ

क्या पीछे लौट जाऊ उनके पास जिन्होंने मुझे मुझसे मिलवाया या फिर बढ़ जाऊ आगे उसके पास जो मेरा वजूद है | (अरे! ये मेरी अंगूठी कहा गयी जो मुझे लक और हिम्मत देती है ), शायद वो भी मुझसे परेशान हो मेरा साथ छोड़ चली गयी |

मुझे आज भी याद है जब मैंने पापा-मम्मी को अपने प्यार के बारे में बताया था , मम्मी थोड़ा नाराज हुई थी पर पापा शांत खड़े रहे थे | कुछ दिनों बाद मेरे हाथों में पुणे की फ्लाइट की टिकट  पकड़ा कर मुस्कुरा दिए.....................और कहा जाओ
"आरोह" जी लो अपनी ज़िन्दगी |

यहां आकर खुश थी लगा सारा जहान मिल गया पर ढूंढते यूँ तुम न मिले, क्यों न मिले इसका कोई जवाब नहीं है मेरे पास ? (अचानक एक आवाज़ पीछे से गुंजी शायद ये मेरी आत्मा है ,जो मुझसे कुछ कहना चाहती है ...........शायद मैं ही थी जिसने अपनी
ज़िन्दगी के सारे किवाड़  बंद कर रखे थे..............पर.....पर रौशनी तो  उस ही  झरोखे से आती है जिसे हम खोलना भूल जाते है |) अब मैं समझ चुकी हूँ मुझे क्या करना है .....मुझे मुंबई जाना है ,अपने प्यार के पास .....अपनी फिल्मों के पास ....पुरे जहान
के पास..........ये देखो ११:२५ की लास्ट लोकल मेरे सामने कड़ी है मुझे आवाज़ लगाती की आ! "आरोह" जी ले अपनी ज़िन्दगी|
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अपनी मंजिलों के सफर को तय करती "आरोह" अपने हाथों में "धर्मा  प्रोडक्शन " का कॉल लेटर  थामे मुस्कुरा रही थी............................अपने सपनो की ओर बढ़ती एक आकांशी फिल्म डायरेक्टर "आरोह"



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