वह पापा की शहज़ादी थी


वह पापा की शहज़ादी थी
बड़े नाज़ों से वो पली बढ़ी
मेहनत की उसने जीवन में
और हुई अपने पैरों पे खड़ी

वो गयी बड़े एक शहर में
रम गयी जीवन की लहर में
वह ना जान सकी अँधेरा है
हैवानियत का वहां बसेरा है

उस रात उसे कुछ देर हुई
सब चले गए वह तनहा थी
दरिंदगी जिसके करीब थी
एक बेबस सा वो लम्हा थी

थी सहमी सी वो उन राहों में
तब उसको था एक हाथ दिखा
मानवता का वह हत्यारा 
अपने साथियों के साथ दिखा

एक मोड़ जहां अँधेरा था 
था वहां भेड़ियों का साया
जब आँखें खोली उसने तो
उन दरिंदों को था सामने पाया

एक बेटी उस दिन चीखी थी
पर कोई मदद ना मिली उसे
उन भेड़ियों ने उसको नोचा 
और वहीं तड़पता छोड़ गए

बड़ा शर्मनाक वह मंज़र था
थी इंसानियत सबकी खोयी
उसकी हालत को देख देख
मानवता तिल-तिल कर रोयी

जब उसके पापा को सच पता चला
उनका दिल सहसा दहल गया
जो चेहरा कल तक खिला सा था
वो चेहरा बिलकुल बदल गया

लाखों चेहरे यूँ ही बदले
जीवन लाखों यूं ही बिगड़े
खुले गुनहगार वो  घूम रहे
ताक़त के नशे में झूम रहे

कानूनी हाथ हुए छोटे
शायद लालच ने है उन्हें तोड़ दिया
गुनहगार तो यूँ हम सब भी है
जो उन कुत्तो को आवारा छोड़ दिया

निर्भया के लिए जी लगा दिया
फिर भी ना उसको बचा सके
हाँ दर्द मुझे भी हुआ था जब
गुनाहगारों को सज़ा न दिला सके

आवाज़ उठेगी  जब जब भी
निज पाखंडी उसे दबाएंगे
बदलाव तभी है सम्भव जब
हम सब मिलकर सामने आएंगे

हैं लाखों लड़कियां उस जैसी।
इन्साफ जिन्हें है मिला नही
हर पल इसी ख़ौफ़ में जीती हूँ
कहीं मैं तो अगली निर्भया नही




*काव्य-रचना*
*शैलेष कुमार पांडेय*
*जी.जी.यू. बिलासपुर*
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