वंडर ऑफ़ बोतल एकांकी (हास्य व्यंग)


पात्र:-

भसकाराम      –       शराबी

फूलनदेवी       -       भसकाराम की पत्नी

लालटेन         -      भसकाराम का मित्र  

कुर्सीमल –       -      सरपंच

बोरादास         -      पंच

टिमटिम चाची    -      वृद्ध महिला

(पर्दा उठता है-................)

         लालटेन का भसकाराम के घर प्रवेश | कुछ छिपाकर दांत दिखातें हुए आता है -

भसकाराम   -    अरे भाई लालटेन ! आते हो कुछ लातें हो, उसे छिपाते हो और दांत दिखाते हो | बात क्या                   

                है ?

लालटेन    -     अरे भसकू हम तोहरे लिए अंग्रेजी अमृत लाया हूँ | पी कर देखो, सरग न दिख जाये तो

                कहना |

भसकाराम   -     पीछे मुड़कर अपनी पत्नी से – अरी फूलों ,हमारा मित्र लालटेन आया है ,हमारे लिए कुछ  

                लाया है, जल्दी जाओ , दो गिलास लेकर आओ |

फुलनदेवी     -    लाती हूँ| काम –धाम तो कुछ करते नहीं हो, बस तुम्हारे नखरे झेलते रहो |

                फुलनदेवी गिलास ले जाकर मेज पर रख देती है और अंदर चली जाती है| 

लालटेन      -    ऐसा लगता है जइसन भौजी को हमारा इहा आना अच्छा नाहीं लगा |

भसकाराम    -    अरे नहीं ऐसी कोई बात नहीं है, वह तो ऐसी ही है |

                लालटेन एवं भसकाराम जमकर शराब पीते है | लालटेन अपने घर चला जाता है |
भसकाराम    -    अरी फूलो हमारा बिछौना लगा दो |

फुलनदेवी     -    जब देखो तब आर्डर झाड़ते हो कुछ खुद भी कर लिया करों |

भसकाराम एवं फुलनदेवी में झगडा हो जाता हैं | भसकाराम नशे में अपनी पत्नी की पिटाई कर देता है |

फुलनदेवी मायके जाने के लिए तत्पर होती है | 

भसकाराम    -    ले जाओ अपनी औलादों को , जीने नही देते |

फुलनदेवी    -     हा –हा मै ही इन्हें अपने साथ दहेज़ में लेकर आयी थी |

भसकाराम   -     अरे तुम कुओ जाने लगी मै ही इन्हें बारात में लेकर गया था |

फुलनदेवी    -     तुम्हारे कारन ही घर का सत्यानाश हुआ है | खाने के लाले पड़ गये है | घर का सामान  

                 बेचकर तो तुम शराब पी गये |

फुलनदेवी घर छोडकर जाती है, तब गाँव वाले उसे न्याय का झांसा देकर रोक लेते है | फुलनदेवी टिमटिम चाची के यहाँ रुक जाती हैं |

                       सुबह पंचायत बुलाई जाती है |

कुर्सीमल      -   टिमटिम चाची ने हमे सब कुछ बता दिया है | भसकाराम तुमने अपनी पत्नी पर हाथ क्यों

                उठाया कुर्सी तोड़ के |

भसकाराम     -  सरपंच जी ऐसा कुछ भी नहीं हुआ था |

टिमटिम चाची  -  ये ससुरा झूठ बोलत है सरपंच जी | इसने शराब पी थी | अरे उही शराब जिसका स्वाद

                पेशाब की भांति होत है |

                अरे इही शराब को पीकर तो छोरा –छोरी लोग डिसकु में नाचत-गात है |

               हमरी संस्कृति को माटी में मिलात है |

बोरादास       -  टिमटिम चाची बिलकुल सही कह रही है , सरपंच जी | हमारा एक भतीजा भी शराब पी

               कर चला रहा था | उसका अक्सिडेंट हो गया अब तो उसका हाथ ही नही रहा जो शराब को

               हाथ लगाये |

                           शराब पीने वालो को होश कहा रहता हैं |

फुलनदेवी    -    यह तो एक लत है, सरपंच जी | एक दिन मुन्नु के पापा और वो लफंगा लालटेन खेत की

                ओर डब्बा लेकर गये थे | मैंने सोचा हवाई –जहाज उड़ाने गये होंगे | मुझे क्या पता था कि                                                  

                डब्बे में भी शराब लेकर गये थे |

                               न्याय कीजिये सरपंच जी |

कुर्सीमल      -   देखो भसकाराम आज तो हम तुम्हे सिर्फ तुम्हारे बच्चो के खातिर छोड़ रहे है, दोबारा ऐसा

                किया तो तुम्हे गाँव से बाहर निकल देंगे कुर्सी तोड़ के |                      

         भसकाराम घर जाता है गाँव के लोग फुलनदेवी को भी समझाकर घर भेज देते है |

         अगली सुबह पुन: गढदे में छिपकर शराब पी रहा था | लालटेन ने देख लिया  

 

लालटेन    -      क्या भस्कू फिर पिनें लग गया हमने तो इ सूना है कि, शराब पीनें से ससुरी  कडनी

          ख़राब हो जाती है |

भसकाराम  -      अरे लालटेन यह तो “वंडर आफ बोतल है “ चाहे जान जाये, हमको तो पीनी है | लें

         तु भी पी |



Comments

Ayush thomash

achhe se samjh me naii aa ra h.....

Anish shriwash

Story to achhi h...but kuch achhe se samajh me naii aaya..